बी-51, करमपुरा से लाईव



सिख संत बाबा करम सिंह के नाम पर बसा मिडिल दिल्ली का करमपुरा। सिख संत के नाम पर इसलिए क्योंकि तक़सीम के बाद रावलपिंडी और लाहौर वाले पंजाब की पराजित होकर भागी क़ौम का ठिकाना बने दिल्ली के दिल का ये एक ख़ास हिस्सा है। हालाँकि श्रीमती सुरिंदर कौर शंटी का पत्ता काट कर कुमारी सुनीता मिश्रा को यहाँ से दिल्ली नगर निगम में भेजना इस बात की ठोस तस्दीक़ है कि डेमोग्राफी अब बदल चुकी है।

...गोभियों की गर्दनें बेरहमी से काटी जा रही हैं। आलू का चीरहरण जारी है। चाय छोड़ कर कुछ भी ढंग से नहीं बना सकने वाला मैं हलवाईयों के काम-काज की निगरानी की ड्यूटी में बैठाया गया हूँ। 
बड़ा सा वाटरप्रूफ पंडाल दो दिनों पहले से तैयार है। बारहों मास, सातों दिन और चौबीसों घण्टे दम नहीं धरने वाली सड़क पंडाल की ठंढी छाँव में लाल-हरे शतरंजनुमा छाप के कालीन ओढ़े आज आराम कर रही है।

दिन की शुरुआत होत फजीरे ( फ़जर मतलब सुबह का भोजपुरी रूप) पाँच बजे हुई। कनॉट प्लेस वाले प्राचीन हनुमान मंदिर फूलवाले के पास से अलग-अलग तरह की बीस मालाएँ और बीस किलो फूल लाने के साथ। आज के दिन के लिए मुनीरका से कल रात ही बुला लिया गया था। पूरा जग सपरा कर मेरी छुट्टी शायद कल शाम हो। तब जाकर वापस अपने पीएचडी साक्षात्कार के लिए शोध प्रस्ताव पर वापस काम कर सकूँगा। 

आज दादी की 30वीं पुण्यतिथि है। दिल्ली वाली दादी। मतलब छोटी वाली मौसी की दिवंगत सासू माँ और मौसा जी की माता जी। 'दिल्ली वाली दादी' मेरे लिए हैं बाकि वो बिहार के ठेठ गोपालगंज की बेटी और बहू थीं। पलायन के दौर में कभी बाल-बच्चों सहित पति के साथ दिल्ली आईं और फिर यही की होकर रह गईं। यम की बहन यमुना में अपने सभी भौतिक अवशेषों के साथ...

...बीच वाले कमरे से दादी की तस्वीर निकाली जाएगी। जो वहाँ तब से हैं जब जब मौसी भी यहाँ नहीं आई थी। मौसी के विवाह के पहले ही वो जा चुकी थीं। मौसी का उनसे परिचय उतना ही है जितना हम सबका। तस्वीरों और बातों वाला परिचय। तो आज उस तस्वीर पर माल्यार्पण होगा और पूरे दिन कार्यक्रम चलेगा। भोज-लंगर से लेकर भजन-कीर्तन सब। पंजाबी पहचान वाले इस मोहल्ले में बिहारी बहुमत जुटेगा। देश बाँटने से हुए पलायन के बाद बने मोहल्ले में अल्पविकसित पूर्वांचलियों के पलायन से बदली यहाँ की पहचान मुज़ाहिरा होगा। 

...बाऊजी, मतलब दादी के पति। मौसा जी के पिता और मौसी के ससुर। बारी-बारी से दो पत्नियों को खोने के बाद नब्बे के दशक में एकदम स्वस्थ हैं। आडवाणी और करूणानिधि की तरह रिटायर नहीं होना चाहते। आम बुज़ुर्गों से बहुत अलग। कड़क और कई बार कड़वे भी। ज्यादतर का कहना है कि दोनों दादियों की जान जाने में इनकी लापरवाही का भारी हाथ रहा। मगर आज सुबह से ही नई कुरता-धोती पहने छड़ी लिए चहलकदमी कर रहे हैं। यूँ भी कह सकते हैं कि डंडा चला रहे हैं। सबको छपा हुआ न्योता भेजा जा चुका पर सुबह से सौ लोगों को फोन कर चुके। 
...किशोरावस्था में ही आ गए थे बाऊजी यहाँ। स्वतंत्र भारत मिल में नौकरी करने। बाद में यूनियन के नेता बने और श्रम मंत्री जगदीश टाईटलर के मित्र हुए। कहते हैं कि इमरजेंसी के बाद जब काँग्रेस से लोग कन्नी काट रहे थे, बाऊजी को टिकट मिल रहा था। मगर तब वे चुनाव नहीं लड़े और इस भूल को ज्योति बसु के प्रधानमंत्री नहीं बनने की ऐतिहासिक भूल की तरह बड़ी शिद्दत से याद किया जाता है। 

मौसा जी, आज के प्रतिबद्ध कारोबारी। सुबह से देर रात मनी मशीन की तरह काम करना। निष्ठा इतनी कि कोई छुट्टी नहीं। ईमानदारी ऐसी की मोटे लोग जब नोटबंदी पर रो रहे थे उन्होंने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए स्वागत् किया और इससे काम बाधित होने की बात आज तक नहीं की। कॉमर्स के अच्छे विद्यार्थी रहे लेकिन तब एक कहावत मशहूर था कि 'बेटी बिगड़ली त बनली नर्स, बेटा बिगड़लें त पढ़लें कमर्स' लिहाज़ा उनकी पढ़ाई पर बाऊजी का ध्यान नहीं गया। आगे मौसा जी ने इण्डियन एयरलाइन्स की नौकरी छोड़ व्यावसाय में हाथ आज़माया। 
...ये सारा आयोजन जिसे मैं लाईव कर रहा हूँ ये उन्हीं की एकमात्र इच्छा है। बाकि हममें से कोई सहमत नहीं है। दादी के छोटे लड़के। छोटा बेटा माँ को ज़्यादा मिस करता है। कहते हैं कि दादी अस्पताल में भरती थीं तब मौसा जी हर मंगलवार हनुमान जी से जान बचाने की गुहार लगाने जाते थे। दादी की मृत्यु शायद कैंसर से हुई थी। तब वे ऐसे नहीं थे कि बचा सकें। हनुमान जी से आस्था उठा कर दादी चली गईं। ढेर सारी मायूसी और ख़ालीपन दे कर। अब मौसा जी केवल भगवान शिव को मानते हैं। माँ के इस ख़ालीपन को अपने तरीक़े से हर साल भरते हैं। पूर्व के आभाव को आज के शानदार सामर्थ्य से भरना... 
ऐसे में क्या ये ठीक नहीं होता कि हर साल दो लाख यूँ बहाने की बजाए किसी ऐसी संस्था को दान कर दिया जाए जो कैंसर के इलाज़ से जुड़ा हो। लेकिन हिंदुस्तान की अपनी उत्सवधर्मीता ! हिंदुस्तान जहाँ पैसों की कमी नहीं है पर लोग बेहाल हैं। शायद ऐसे ही खर्चों के कारण... ख़ैर

प्रशांत और निशान्त तिवारी, दोनों मेरे से छोटे मैसेरे भाई। बिहारी माता-पिता के दिल्ली बॉर्न डेलाइट्स, बिहारी मूल की पहचान और पंजाबी कल्चर डॉमिनेटेड करमपुरा के दोनों नौजवान। नीक नेम - सन्नी और काकू। दोनों का एक स्वर से कहना है कि पार्टी एसी वैंकेट हॉल में करनी थी। सैकड़ों को बुलाने की बजाए दादी से कन्सर्न लोग ही इन्वाइट हों। 
...छह महीने पहले मौसा-मौसी की 25 वीं सालगिरह की पार्टी की कमान इन्हीं के हाथ थी। जिसका संदर्भ आज के लिए दे रहे हैं। एसी वैंकेट हॉल, शानदार खाना, अच्छा ड्रिंक, डीजे और सेलेक्टेड क्राउड। हमारी पीढ़ी के उत्सव का तरीक़ा...

फ़िलहाल, कीर्त्तन में आए सिंगरों ने बारी-बारी से लखबीर लक्खा का छाव-भाव उतार लिया। राधे-कृष्ण रास कर चुके। भजन में नागिन डान्स वाला तर्ज़ आ गया है। मोहल्ले की आंटियाँ नाच रहीं। पार्षद सुनीता मिश्रा जी भी अपने पूर्वांचल आधार को ठीक रखने पधार चुकी हैं। अब ज़रा शिव तांडव कर जाएँ तो इसका समापन और भोज शुरू हो... वैसे नेताओं के आगमन से भी किसी प्रोग्राम का क्लाइमेक्स समझ जाना चाहिए। क्योंकि ये देवदास की सुमित्रा काकी की तरह हमेशा मौक़े पर ही आते हैं। 
बाय बोल कर चलता हूँ। खानसामों से अपडेट लेता हूँ। सिस्टम बुफे वाला है, ख़ुदखाऊ। लेकिन बाहर ढेर सारे रिक्शे वाले, काम वालियाँ और सरकारी स्कूलों के मुचड़े यूनिफार्म वाले बच्चे इंतज़ार कर रहे होंगे। इसके समानांतर भण्डारा भी है। हलवा-पूरी बाँटने चलता हूँ...

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