दोआबे से बहती लोर की नदी

पीछे गाँव के पधेया और हमारे गाँव के दूबे लोग जाने कब से आपस में शादी-सम्बन्ध करते रहे हैं| जैसे 'कलकलिया' और 'मछहा नारी' के दोआबे का पानी पूरब की ओर बह कर हमारे उत्तर सरेह में 'गोधन बाबा के बाँध' से होकर ब्रिटिश समय के  'पकवा पुल' के नीचे से गुजर कर 'भेलानारी' से जा मिलता है, वैसे ही दोआबे में बसे उन दो गाँवों में रहने वाले एक ही वंश के पधेया लोगों की बेटियाँ हमारे गाँव आती रही हैं| ख़ासकर मेरे घर में| 

उन गाँव-घरों का हमारे गाँव-घर से ऐसा नाता रहा है कि उधर मेरे बाबा का 'अजिऔरा' था और अब जब मेरे बच्चे कभी होंगे तो उनका अजिऔरा भी दोआबे के वहीं गाँव होंगे| अजिऔरा मतलब दादी का मायका| मेरे बच्चों की दादी मेरी अम्मा और उनका मायका वे गाँव| मेरे बाबा का अजिऔरा मतलब मेरे परबाबा का ननिहाल और मेरे बच्चों का अजिऔरा मतलब मेरा ननिहाल| मेरे स्वर्गीय बाबा ने अपनी आजी के मायके वाले  गाँव-घर में से ही अपने बेटे का रिश्ता जोड़ा| अपनी आजी और अपनी बहू आने के इस बीच बाबा ने अपने दो चचेरे भाइयों का ब्याह भी अपने अजिऔरा के परिवार की रिश्ते में बहन होने वाली दो लड़कियों से कराया| इस तरह से हम उन गाँवों से अटूट बंधन में बँध गए| 

मेरे बाबा की दादी, मेरी ख़ुद की दो चचेरी दादियाँ और मेरी अपनी अम्मा, सबका साझा मायका| मेरे पूर्वज, पितामह के पितामह, पितामह के दो भाइयों और मेरे पिता की, हमारे गाँव-घर के कई पुरुषों की ससुराल... 

हमारी अम्मा के नैहर-सासुर के बीच की दूरी इतनी कम रही कि उस गाँव के चूल्हे पर छूटी 'पछली-टिकरी' को अपनी चोंच में दबा कर उड़ा काग आकर हमारे गाँव-घर में गिरा दे| उस गाँव से विदा होती बेटियों की रुलाई यहाँ तक सुनाई पड़े| यहाँ तक कि उधर कि हांडी में पकते उड़द-दाल की बास उड़ते-उड़ते इस गाँव आ जाए| बरसात के दिनों में घास काटते, उजाह के दिनों में मछली मारते और नेता का गाँव होने से एक अदद घर और चापाकल की फ़रियाद लिए मेरे ननिहाल के लोग अक्सर मेरे गाँव में ही दिखते| कई बार जब प्यास लगती तब आकर अपने गाँव की यहाँ बसने वाली बेटियों के घर पानी पीते और घण्टों बतियाते| 

...पितरपख के संक्रांत वाले, बरखा-घाम और जर-बोखार वाले दिन थे| मेरे दरवाज़े पर एक बैलगाड़ी रुकी थी और गाड़ीवान के  दोनों तरफ़ से ज़वान होते दो लड़के कूद कर उतरे थे| उन लड़कों का निकलता हुआ क़द और रंग उन दोनों धवरे बैलों सा ऊँचा और धवल था| आते ही दोनों ने बिना दुआ-सलाम के मेरी अम्मा से कहा था -  ''जल्दी चल फुओ, बाबाजी के बहुत सीरियस बा..'' वे लड़के अपने बाबा को 'बाबूजी' ही कहते थे| संयुक्त परिवारों में यही तो होता है| दो पीढ़ियों के बच्चों में इतना कम अंतर होता है कि बुआ बहन हो जाती है और बाबा बाबूजी| 

एक भारी-भरकम खेती-किसानी वाले घर की एकमात्र बहू होकर अम्मा मशीन की तरह रात-दिन एक करके खटती थीं, उन्हें किसी और बात के लिए जरा भी फ़ुर्सत नहीं मिलती थी| भतीजों के कहे के बाद भी अम्मा कुछ काम निबटाने लगीं थीं| तभी कमरे से दादी ने कुछ डपट कर कहा और सकपकाई हुई अम्मा मुझे गोद में उठाए और बिना नई साड़ी पहने जाकर सीधे  बैलगाड़ी में बैठ गईं| धूल उड़ाते बैल चले और अम्मा की गोदी में बैठा अबोध सा उनका छोटा बच्चा - मैं| 

आज मेरे दोनों भाई-बहन भी गाड़ी में चुपचाप बैठे थे और चलती गाड़ी में किनारे तक जाकर कूदने के लिए डाँट नहीं खा रहे थे| यहाँ तक कि हम तीनों ही पड़ोसियों को चिल्ला-चिल्ला कर 'मामा किहाँ जा तानी - मामा किहाँ जा तानी' नहीं गाकर नहीं सुना रहे थे| 

पँचपटिया का तड़बन्ना ही तो था जो सड़क के रास्ते में दोनों गाँवों को बाँटता था| नहीं तो खेतों के होकर कोई बँटवारा नहीं था कि कहाँ मेरा गाँव ख़तम हुआ और कहाँ मामा का शुरू हुआ| मामा के गाँव के पानी से हमारा सरेह हमेशा तर रहता था और हमारे खेतों से मामा के सरेह भरे थे| 

तड़बन्ने के पार होते बलुआ का टोला और उसके बाद बनखंडी के पोखरे से शुरू होती अहीर टोली यही था हमारा ननिहाल| हमारी गाड़ी अम्मा के फुलमान काका उर्फ़ फुलमान राउत के घर से निकली तो पीछे-पीछे औरतों-बच्चों की भीड़ जुड़ने लगी| अम्मा के मायके पहुँचने पर बैलगाड़ी के पीछे औरतों-बच्चों का हुजूम इकट्ठा होना कौन सी नई बात थी| दरवाज़े पर पहुँच कर बरामदे में एक भीड़ दिखाई दी, यह भी नई बात नहीं थी| नाना बेशक वीतराग थे मगर अंग्रेजों के ज़माने में ज्यूरी सदस्य थे, पण्डित थे और आज़ादी के बाद हुए चुनावों में बेशक सरपंची हार गए थे मगर नए बने सरपंच ने अपना सारा काम उन्हें ही दिया हुआ था| इसके अलावे वे जड़ी-बूटी और आयुर्वेद की अच्छी जानकारी रखते थे, वैद्यकी भी करते थे| एक प्रकार से वे सारे गाँव के अभिभावक जैसे थे| उनके पास भीड़ लगा रहना नई बात नहीं थी| नई बात थी तो दुआर पर छिले जा रहे हरे बाँस और सूखी लकड़ियों की सिल्ली पर चलती कुल्हाड़ियाँ|

इतने भर से अम्मा को सब समझ आ गया और वे  'बाबूजी हो बाबूजी' बोल कर चिल्ला उठीं और ज़ल्द ही दहाड़ें मार कर लगीं| बड़ी बेटी जो थीं| उनके दिए इस शोक की लय के पीछे बाक़ी औरतें जो पहले से ही रो रही थीं, नए सिरे से चिल्लाने लगीं| 
भीड़ के बीच ज़मीन पर बिछी काली भेड़िहा कम्बल पर चंदन के काठ सी स्वच्छ-धवल और पवित्र नानाजी की निष्प्राण काया| चेहरे पर वहीं करुणा जिसे कभी देख कर कोठी के अंग्रेज अफ़सर ने भी दया की थी और बेगार के लिए ज़बरन लाए गए दस साल के इस बिना बाप के बेटे को देख अपने कारिंदे को डाँटा था| वहीं नानाजी जिनका चेहरा देख अंग्रेज अफ़सर का मन बदल गया था आज पत्नी का मन टूट गया है|

आँगन में रोतीं नानी का हाथ सिलबट्टे पर रख कर पत्थर के टुकड़े से उनकी चूड़ियाँ तोड़तीं बड़की मामी| अबोधपन इतना था कि बड़ी मामी से डर कर बाहर भाग गए कि बड़की मामी हमारी नानी को ईंट से मार रही है उससे छूटते अब हमें भी मारेगी| 

बाहर लकड़ियों के ढेर पर खेलने लगे| रोज ही तो अपने से कुछ बड़े बच्चों के खेल में जाकर देखता था कि आज गुड़िया की शादी होती है और कल उसके पति को जला कर सब बच्चे रोते थे| लगता था कि अम्मा ऐसे ही किसी खेल में खेलने आई हैं| उस उम्र में सबकुछ खेल ही तो लगता है| ..मगर ये खेल बहुत लम्बा चला| लोगों का आना और घर की औरतों का बाहर निकल कर रोने लगना, सबकुछ कई दिन हुआ| नानाजी भी तब से नहीं दिखे| शायद वहीं से खेल की दुनिया से दुनिया के खेल को समझने की चेतना हुई| 

मेरे परदादा के, मेरे और मेरे चाचा-ताऊओं के साझे ननिहाल में त्रासदी का वही दृश्य कल की रात भी मौजूद था| नानाजी का घर| गोल बरामदा और भीड़| चंदन काठ सी लेटी एक और काया और नानाजी की तरह करुणा से भरा हुआ दस सालों का पितृहीन हुआ एक बच्चा| आँगन में सुहाग हटाने की क्रूरता अबकी नानी के पोते के साथ मात्र 17 साल रह कर विधवा हुई और बार-बार बेहोश होती उसकी पौत्रवधू के साथ हो रही थी|

कल रात से अब तक उधर के दोआबे से भारी शोक बह कर आया है और हमारे सरेह की मिट्टी को काला कर गया है| इधर की औरतों ने उधर से आती विलाप की आवाज़ को सुन कर आँखें सजल की हैं| आज शाम मेरे गाँव की गन्ध में मेरे नाना के आँगन में पकती क्रियाकर्म में रिन्हे जाने वाले उड़द के दाल की बास होगी| 

मेरे गाँव में हर नुक्कड़-चौराहे पर मिलते लोग इसी की बात कर रहे हैं कि भगवान किसी माँ-बाप को ये दिन नहीं दिखाए| कल शाम को नैहर गई माँ अब तक नहीं लौटीं हैं| अपने व्रत-पूजा में नैहर और भाई-भतीजों की ख़ैर-बढ़न्ती माँगने वाली बेटी अपनी आस्था टूटने की चोट से चोटिल होकर मायके के आँगन में बैठी रो रही है| देख पा रहा हूँ, उसके आँसू बह कर हमारे गोएड़ा तक आ गए हैं| दोआबे के उन गाँवों के रिश्तेदार के रूप में मेरे गाँव-घर के लोगों का मन खारा हो गया है...

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