समा-चकेवा अपने पौराणिक महत्त्व के साथ-साथ कर्णप्रिय मधुर गीतों के लिए भी जाना जाता है । चाहे चकेवा को चराना हो,पानी पिलाना हो,काजल लगाना हो या फिर उनकी विदाई करनी हो,हर मौके पर भाई-बहन के घनिष्ट संबंधों को रेखांकित करने वाले गीत होते हैं।
आइए आपको कुछ झलकियाँ दे दूँ...
1
" एह कुरss चकवा भइया खेले गइले शिकार... ओह कुरss खिड़लीच बहिना रोधाना हो पासार... चुपss होखू चुपss होखू बहिना हो हामार,बाबा के सम्पत्तिया हो बहिना आधा देहब हो बाँट...
बाबा के सम्पत्तिया हो भइया तोहरे के हो बाढ़... हम दूर देशी बहिनिया मोटरीए करब हो आस । "
समा-चकेवा के इस मधुर गीत का अर्थ हुआ -
नदी के इस तरफ चकेवा भाई शिकार खेल रहा है और उस पार बैठी उसकी खिड़लीच बहिन रो रही है। इसपर चकेवा कहता है की रोना छोड़ो और चुप हो जाओ, बाबा की आधी संपत्ति मैं तुम्हें दे दूंगा। इसपर तुनक कर खिड़लीच कहती है की 'बाबा की संपत्ति तुम्हें हीं मुबारक हो भाई। मैं तो परदेश की वासी बहिन हूँ इसलिए तुमसे चिवड़े और ठेकुए की एक गठरी से अधिक की आशा नहीं करती। '
2
" ग्राम के अधिकारी तोहे बड़का भईया हो !
ग्राम के अधिकारी तोहे छोटका भईया हो !
भईया हाँथs दसs पोखरा खोनाय दिहs चंपा फूल लगाय दिहs हो...
भईया लोढ़ाएल भउजो हार गाँथू हे, आहे सेहो हार पहिरी छोटकी बहिनी संग चकेवा खेलsब हो... "
एक बहन अपने बड़के और छोटके भाई से अनुरोध करती है कि तुम गाँव के मालिक हो,मेरे लिए एक दस हाँथ का पोखरा खुदवा दो और चंपा के फूल लगवा दो। तुम उस फूल को तोड़कर लाना और भाभी मेरे लिए हार गूंथ देगी। फिर मैं उसी हार को पहनकर छोटी बहिन के साथ चकेवा खेलने जाउंगी।
3
" सामा खेले गइनि चकेउवा भईया के आँगनs हो... आहे सामा भउजो देली लुलुआइ छोड़हूँ ननद आँगन
का तुहों भउजी हमें लुलुआवेलु हो
आहे जले रहियें माई-बाप के राजs तलहीं सामा खेलबss
आहे छूटी जइहें माई-बाप के राज छोड़बs सामा खेलsल... "
सामाँ खेलने के लिए लड़कियां चकेवा भईया के आँगन में जाती हैं जहाँ उसकी पत्नी यानी लड़कियों की भाभी उन्हें डांट कर आँगन छोड़ने को कह देती है। इसपर बहन तुनक कर कहती है की तुम क्यों डांटती हो हमें ? जब तक हमारे माँ - बाप का जमाना है तबतक हमें खेलने दो। जब माँ-बाप का जोर ख़त्म हो जायेगा तो हम भी खेलना छोड़ देंगी। ं
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