पंडित राजकुमार शुक्ला के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने चम्पारण में हो रही नील कृषि और किसानों के शोषण के विरुद्ध सन 1907 से हीं एक व्यापक अभियान चलाया था।सन1916 में लखनऊ में हो रहे कांग्रेस अधिवेशन में गए तो वहां उनकी भेंट मोहन दास करमचंद गाँधी से हुई। तब वे नए - नए दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे और देश भर में दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध किए अपने अहिंसात्मक आंदोलनों के कारण जाने जाने लगे थें। पंडित शुक्ला ने उनसे चम्पारण चलने और वहां हो रहे किसानों के शोषण के विरुद्ध आन्दोलन का नेतृत्व करने का अनुरोध किया।
इसे स्वीकारते हुए अगले साल अर्थात अप्रैल 1917 में मोहनदास मोतिहारी पहुंचे और आगे क्या हुआ यह संसार से छुपा नहीं रहा... मोहन दास 'महात्मा' कहलाएं और कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेता भी।
जिस मोहन दास करमचंद गाँधी को महात्मा बनाने में पंडित शुक्ला ने अपना योगदान दिया वहीं आगे चलकर दुर्दशा के शिकार हुए। पहले वे जमींदार थें किन्तु देश की लड़ाई लड़ते-लड़ते जल्द हीं कंगाल बन बैठें और अत्यधिक दारुण दशा में सन 1929 में मृत्यु को प्राप्त हुए।कहा जाता है कि तब उनके परिजनों के पास उनके अग्नि संस्कार के लिए भी पैसे न थें। उस समय बेलहा कोठी के नील ठेकेदार एसी एम्मन ने 300 रुपये दिए जिनसे पंडित शुक्ल पंचतत्व में विलीन हुए।
विडम्बनापूर्ण है कि जिन अंग्रेजों के विरुद्ध वे जीवन भर लड़ें अंत में उन्हीं में से एक के पैसों से उनकी अंतिम गति हुई। सोंच कर कष्ट होता है कि जिस पंडित शुक्ल ने चम्पारण सत्याग्रह का नेतृत्व सौंप कर कई लोगों का सिक्का चमका दिया उन में से किसी ने भी उनकी दारुण दशा का ध्यान तक न रखा।चम्पारण सत्याग्रह का हीरो अँधेरे में चला गया,मर भी गया पर देश के नेताओं ने उन्हें खोजने की जहमत भी न उठाई। अब पुरे दावे के साथ कह पाउँगा की पंडित शुक्ल की मृत्यु से हीं निरंतर देश के नेताओं द्वारा चम्पारण की उपेक्षा करते रहने की होड़ का श्रीगणेश हुआ। चम्पारण के हीरो पंडित शुक्ल भुला दिए गए,चम्पारण को तो भुलाया जाना हीं था।
एक और बात बता दूँ आपको कि जब एसी एम्मन ने उनकी अंत्येष्टि के लिए रुपए दिए तो उनके सहायक ने पूछा कि जो आपसे और आपकी सरकार का शत्रु था आप उसके अंतिम संस्कार के लिए रुपए क्यों दे रहे हैं ? तो इसपर एसी एम्मन का उत्तर था - 'वहीं तो चम्पारण का एकमात्र मर्द था जो लगातार बिना हारे हमसे लड़ता रहा... वो भले हीं हमारा दुश्मन रहा हो किन्तु मैं उसे सलाम करता हूँ।'
जब पंडित शुक्ल का श्राद्ध कर्म हो रहा था तो मर्माहत एम्मन ने डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद से कहा था कि अब मैं भी ज्यादा दिन नहीं जिऊंगा। और हुआ भी वहीं.... कुछ हीं महीनों बाद एम्मन की भी मौत हो गई।
पीड़ा होती है जानकर कि चम्पारण के इस लाल का महत्व उसके धूर शत्रु एक फिरंगी ने समझा पर उनके समकक्ष कांग्रेस के नेताओं ने नहीं। आज भी चम्पारण के लोंग गाँधी-आंबेडकर में हीं उलझे हैं और अपने उस वीर पुत्र को काफी हद तक भूले बैठे हैं जिसने इस मिट्टी का ऋण उतारने में जमींदार से कंगाल बन जाने से भी गुरेज नहीं किया।
आज भी चम्पारण में गाँव-नगर,रेलवे स्टेसन,विद्यालय-विश्वविद्यालय और पुस्तकालय इत्यादि पंडित शुक्ल के नाम पर नहीं हैं। यदि गलती से होंगे भी तो मेरे जैसे देश-दुनिया की खबर रखने वाला आदमी नहीं जानता कि ये कहाँ हैं !
28 नवंबर को पंडित शुक्ल द्वारा पूर्व में कैथी लिपि में लिखी उनकी डायरी पर आधारित एक पुस्तक 'पंडित राजकुमार शुक्ल की डायरी' का लोकार्पण हो रहा है। इसे संकलित और प्रकाशित करवाया है बिहार विधान परिषद के कार्यक्रम अधिकारी भैरव लाल दास ने। श्री दास की पुस्तक के द्वारा स्वर्गीय पंडित शुक्ल को और भी जानने का अवसर मिलेगा। श्री दास कोटि-कोटि साधुवाद के हकदार हैं।
अंत में चम्पारण के एक युवा के रूप में पंडित शुक्ल को अश्रुपूरित नेत्रों से श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए पूर्व में चम्पारण और भारत के द्वारा हुई उनकी उपेक्षा के लिए क्षमा मांगता हूँ...
इस साल साल भर कम से कम चम्पारण और गाँधी जी से जुडी कहानी चलाएं
ReplyDelete--अरविन्द, 09771927000