दादी की डोर

रजाई में छुपकर दादी से कहानियाँ सुनता तो अक्सर मेरे जनेव का गीत गातीं ... पिताजी को उलाहने भी देतीं, न जाने क्यों ऐसा सोचती थीं कि हमारा जनेव वो देख नहीं पाएंगी और दादाजी की तरह हीं हमें छोड़ जाएँगी. फिर मन को तसल्ली देतीं और कहतीं कि - " अगर मैं मर गई तब भी तुम्हारा जनेव जरुर देखूंगी...माड़ो के बांस पर चिरई बन कर बैठी रहूंगी."
 इतनी आतुरता थी दादी  की, हमारे जनेव के लिए.हो भी क्यों नहीं अपनी हमेशा खराब रहने वाली तबियत को देखकर इतना तो जानती ही थीं कि हमारे विवाह तक जी न सकेंगी, तो जनेव हीं भला देख लें...


आखिर एक दिन पिताजी ने उनकी मुराद पूरी कर हीं दी.
" बड़का चौदह का हो गया और छोटका भी आठ का,जनेव की उमर तो हो हीं गयी  और माई की भी दिन-रात यहीं रट है.. जिस तरह से बीमार है उस तरह से कुछो हो गया तो बड़ा अफ़सोस रह जायेगा."
इन्हीं शब्दों में घोषणा हुई थी. बस ! फिर क्या था दादी के अरमान जैसे पुरे हो गए. रात-दिन उनके गाये गीतों से घर-आँगन गुलजार रहा करता...
" पानs के पतवा झूरा गइले बरुआ भूखा गइले "
साथ में आंसुओं की अनवरत धारा भी बहाया करतीं... "मालिक साहेब को ये देखना नसीब न हुआ... काश ! कि वो आज होते तो कितने खुश होते. "

फागुन में ठंढ़ ज्यादा होती है और वैशाख में गर्मी के साथ गेहूं की कटाई भी शुरू हो जाती है इसलिए दिन तय हुआ चैत नवमी का, २६ मार्च १९९९ का.
दो महीने पहले से हीं बाल कटवाने पर रोक लग गयी, अब उसमें रोज रात को कडुआ तेल लगा कर "लपरी" पोसने का काम शुरू हुआ... ये मेरे जन्मजात बाल थे जो उपनयन के दिन बुआ लोग के आँचल में जड़ से कट के गिरने वाले थे.
भैया को बेतिया हॉस्टल से एक हफ्ते पहले बुला लिया गया और फिर शुरू हुई रस्में जिनमें हम दोनों भाईयों को साथ बैठा देख कर दादी "राम-लक्ष्मण" से तुलना करने लगतीं.
पन्चघान हुआ फिर लगन चुमौनी हुई. हाँथ में चाकू और सुपारी देकर शख्त हिदायत दी गयी कि इसे हमेशा साथ में रखना है... अकेले नहीं घूमना है और लोहा पत्थर को हाँथ भी नहीं लगाना है. भैया तो नियम मानता और एक कमरे में अपनी किताबों के साथ बंद हो जाता, पर मेरा क्या होना था ! नया - नया पतंग उड़ाना सीखा था छुप-छुपा के गेहूं के खेतों में तो भागना हीं था. जब बात पता चलती तो पकड़ के लाया जाता पर मार या डांट तो पड़ती नहीं थी, जनेव हो रहा था. जिस काम की इतनी बड़ी योजना थी,इतना खर्चा था और इतने सपने भी थे उसके केंद्र में भाई के साथ तो मैं हीं था न,फिर मुझे मार कैसे पड़ती !
मार्च का वो आखिरी हफ्ता था जब सरसों की कटाई चल रही थी और खेतों में सूरजमुखी पूरी जवानी के साथ मुस्कुरा रही थी, हमारे अंगने में हरे-हरे बांस गड़े और कथा-मटकोर हुआ. मुझे सभी रस्मों में खूब मजा आता था , कैसे बड़की भाभी ने हल्दी चढाते वक्त गाल पर चिकोटी काटी थी और हल्दी चढाते वक्त लाल चाचाजी की बड़ी मामी और मौसी ने कैसी मरम्मत की थी, सोलह साल बाड़ सबकुछ ज्यों का त्यों याद है. भैया ठहरा मिशनरी का विद्यार्थी और किताबी कीड़ा, उसे ये सब झेलना पड़ता था.

फिर वो दिन आया जब दादी बिना चिरई बने अपने सपनो को साकार होता देख सकती थीं... सबकुछ देख सकती थीं.
माँ ने हरे आँचल की पीली साड़ी पहनी और पिताजी ने धोती के साथ सिल्क का कुरता. पितृपूजन के समय दादाजी को याद करके फूट - फूटकर रोने लगे. हमेशा डांटने वाले कडक मिजाज़ पिताजी रो भी सकते हैं ! अजूबा हीं था देखना.छत पर लाउडस्पीकर का चोंगा लग गया था,पिताजी ने पहले हीं कह रखा था कि चोंगे का मूंह पश्चिम की ओर रहेगा ताकि एक किलोमीटर पीछे ननिहाल में बैठी नानी नातियों के जनेव का आंखोंदेखा हाल सुन सके...सबकुछ सुन सके... समधियान में कैसे आती बिचारी ?
दीदी भी फुल टशन में ! लपरी लोकना था,कौनो ठट्ठा थोड़े था ! गैलेज वाला फरोक पहिन कर रेडी थी.पूजा दीदी ने सुनहले लैश का लाल लहंगा तो अनुपम भैया ने जींस टी-शर्ट.मेरा क्या था अभी तो तेल-हल्दी से चुपड़े कुरते में था और थोड़ी हीं देर बाद एक हाथ के कपड़ों की लंगोट पहनाई जानी थी. कोई किसी से कम न था. पूरा घर नाते-रिश्तेदारों और इष्ट-मित्रों से भरा था. बाहर से अच्छे-अच्छे खाने की खुशबू आ रही थी पर मुझे मिलना तो था नहीं,ममेरी बहन निगरानी में थी की मैं कहीं कुछ खा न डालूं . हाँथ में शरबत का गिलास और छेना लेकर मेरे भूख के अग्निकुंड में समिधायें देती.
कई दिनों की मजेदार रस्में अब मुझे थका रही थीं,मैं सोना चाहता था पर सोता कहाँ ? पूरा घर तो भरा था. फिर मरता क्या न करता ! बाथरूम गया और वहीं सो गया.इधर जब विधि शुरू हुई तो 'बरुआ' गायब , मचा हडकंप ! बाड़ में जब बाथरूम से सोये हालत में बरामद हुआ तो सबको गुस्से के बदले हंसी आई.
११ बजे से शाम पांच बजे तक भाई के साथ माड़ो में पिताजी और आचार्यजी के साथ बैठा रहा. आठ साल का मैं... उपवास में उतना बैठना,कमर टूट गयी थी...
आचार्य जी और बाजी लोगो में माइक के लिए कम्पीटिशन हो रहा था. एक पक्ष मंगल गाना चाहता था तो दूसरा वैदिक मंत्रोचारण करना चाहता था.बाल मुंडा दिए गए और दीदियों और बुआओं ने अपने आँचल में जमा कर-करके ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित किया. जनेऊ पहनाया जा चूका था. आचार्य जी वचन दिलवा रहे थे.भैया सबमें जी-जी कर रहा था पर मेरे लिए  'कभी पेड़ पर नहीं चढ़ोगे' 'कभी नाच नहीं देखोगे' और अब 'मांसाहारी भोजन नहीं करोगे' इन वचनों में सहमती देना  कितना मुश्किल था मैं हीं जनता था. वचन लेते जब रोनी सूरत बनाई तो पूरा गाँव हंसा. माड़ो के ठीक पीछे अपनी देवरानियो के साथ बैठी दादी माँ कभी गीत गातीं तो कभी ख़ुशी के आंसू रोतीं.
" हाँथ में लिए छड़िया पियरिया चादर ओढ़,पढने -लिखने चल्ले बबुआ नगरी के ओर..."
उनका हृदय जुड़ा रहा था.

शाम को सभी रस्मों के बाद अच्छे - अच्छे कपड़े पहना कर माड़ो में बैठाया गया. किसी ने माला पहनाई तो कोई पांव रंग रहा था.बड़की फुआ ने सोने की अंगूठियों से हमारी उंगलियाँ सजाई और बार-बार चूम के बलईयाँ ले रही थीं. अब हम योग्य हो चुके थे,दान देने और यज्ञ करने के लिए. दादी,माँ, बुआ,मौसी सब भावुक थीं कि अब हम बड़े हो गये. एक समारोह ने सबकुछ बदल दिया था.हम बच्चे से बड़े हो गए थे, पिताजी दादी माँ के प्रति अपने कर्म से निश्चिन्त हो गए थे और दादी की अंतिम अभिलाषा भी अब पूरी हो चूकी थी.

उसके छः साल बाद जब दादी ने विदा ली तो नारायणी के जल में खड़े होकर उँगलियों में जनेऊ लिए उन्हें 'तिलांजलि' दी तब जाकर महसूस हुआ उस धागे का मतलब. मैं पूरी तरह से ब्राह्मण धर्म का पालन तो नहीं कर पाता पर बिना जनेऊ के एक दिन नहीं रहता.ऐसा लगता है कि वो दादी का धागा है.उसी के सहारे दादी बंधीं हैं हमारे साथ.


बचपन का वो आयोजन भूल नहीं पाया जब मैं इतने लोगों के आकर्षण का केंद्र था. सभी रस्मों को निभाते जितना मज़ा आया था तब, अब विवाह में भी वो रोमांच न रहेगा...

Comments