जात - धरम को बहुत अधिक तवज्जो देने वाले हमारे देश में हर किसी के लिए एक विशेष धारणा गढ़ी गयी है... ये धारणाएं कई बार गलत होती हैं तो कई एक मामलों में सही भी होती हैं. ऐसी हीं एक धारणा है कि मुसलमान राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं करते, वे प्राय : दार-उल-हरब की जगह दार-उल-इस्लाम में विश्वास करते हैं. उसी प्रकार की एक धारणा समाज में ये है कि 'कायस्थ' को अपनी जन्मभूमि, अपने गाँव से विशेष लगाव नहीं होता और मज़बूरी में हीं ये गाँव में रहते हैं, फिर जैसे हीं मौका मिलता है ये शहरों की ओर भागते हैं... वो शहर भले हीं दिल्ली-मुंबई न होकर जिले का मुख्यालय या फिर कोई तहसील मुख्यालय हीं हो, कायस्थ सुविधानुसार वहीँ बस जाते हैं. फिर जैसे मौका मिलता है उस स्थान से बेहतर किसी और जगह पर जाने में देर नहीं करते.
बात सही भी है... कायस्थ आमतौर पर स्वाभाव से किसान नहीं होते. ब्रह्मा के पूत्र चित्रगुप्त जी के ये वंशज कलम और दवात से विशेष रूचि रखते हैं और पढ़ने-लिखने को हीं अपना मुख्य ध्येय समझते हुए दुनिया के लंद-फंद से आम तौर पर दूर हीं रहते हैं. यहीं कारण है कि बेहतर शैक्षिक भविष्य और सुख-सुविधाओं की तलाश में ये प्राय: शहर की ओर चले जाते हैं. साथ हीं फैशन,बेह्तर खान-पान और सबकुछ दांव पर लगाने वाली महत्वाकांक्षाएं भी इनमें पाई जातीं हैं,यहीं कारण है कि ये शौक से अपने गाँव में नहीं रहते...
बहरहाल, अपनी कहानी की ओर आता हूँ...
दादी के घर से तब से जुड़ाव है और उस घर की एक-एक बातें याद हैं जब ठीक से होश भी नहीं संभाला था. फिर भी, यादों का सफ़र वहां से शुरू होता है जब दादी के आँगन में हरे-हरे बांस गड़े थे और उसके मड़वे के नीचे पिली साड़ी में बैठी गुड़िया फुआ को मट्कोर की हल्दी लग रही थी.
" कवना कटोरिया में अपटन-तेल, कवने कटोरिया फुलेलs अपटनs लागी रही..."
गाने वालियों में मेरी माँ के भी स्वर थे और हम मड़वे का बांस पकडे दोनों भई-बहन इसी चिंता में दुखी थे कि अब गुड़िया फुआ के जाने के बाद टीवी कौन चलाएगा ?
जैसे हमारे ऊपर एक बहुत बड़ा संकट खड़ा हो... गुड़िया फुआ हीं ठीक से टीवी चलाती हैं, दादी से तो झिलमिलाने लगता है... बाबा और परतिमा फुआ को तो लूरे नहीं है.
खैर इसी चिंता में अगले दिन बारात आई और हमारे बेहद रुढ़िवादी गाँव में एक अजूबा वाकया हुआ - वो वाकया था भरे समाज में बाहर बने स्टेज पर गुड़िया फुआ का जयमाल होना. गाँव में पहला मामला था.
उस भीड़ में कुछ देख नहीं पाए कि ये अजूबा कैसे घटा पर हमेशा सलवार - कमीज में रहने वाली गुड़िया फुआ को कत्थई साड़ी और लाल चुनरी में देखना बहुत बड़ा अजूबा था हमारे लिए. एकदिन में इतना कुछ कैसे बदल गया ! आज तो फुआ ने माँ की तरह लाल बिंदी भी लगाईं है, वो भी एक नहीं बल्कि कई, भौहों के ऊपर भी.
उस भीड़ में कुछ देख नहीं पाए कि ये अजूबा कैसे घटा पर हमेशा सलवार - कमीज में रहने वाली गुड़िया फुआ को कत्थई साड़ी और लाल चुनरी में देखना बहुत बड़ा अजूबा था हमारे लिए. एकदिन में इतना कुछ कैसे बदल गया ! आज तो फुआ ने माँ की तरह लाल बिंदी भी लगाईं है, वो भी एक नहीं बल्कि कई, भौहों के ऊपर भी.
इसी उधेड़बुन में गुड़िया फुआ ससुराल भी चली गयी और हमारी शंका का समाधान भी हो गया. प्रतिमा फुआ ने टीवी चलाने की जिम्मेवारी बखूबी संभाल ली थी. रविवार को सुबह की रंगोली,बृहस्पतिवार रात की कृष्णलीला और शनिवार को दो बजे दिन में नेपाल दूरदर्शन से हिंदी फिल्मों का चलना सबकुछ आबाध चलता रहा.
पूरे पड़ोस में तब वहीं एक ब्लैक एंड वाइट टीवी ऐसा था जहाँ कोई भी आकर देख सकता था. बाकि जगह लोगों का घुसना अलाऊ नहीं था. दादी का घर तो हमारे लिए अपने घर सा हीं था. वो कायस्थ और हम ब्राह्मण, पर हमेशा अपने पट्टीदारों से ज्यादा रहा उनके घर से. रहे भी क्यों नहीं, माँ कहती है कि जब भैया - दीदी एकदम छोटे थे तभी मेरा जनम हुआ और दादीमाँ के बेहद ख़राब रहने वाले स्वास्थ्य के कारण माँ बच्चों को लेकर परेशान हो जाती. उस समय दादी हीं थीं जिन्होंने भैया-दीदी को हमेशा अपने घर में,अपने साथ रखा और अपनी दादी सा स्नेह देकर उन्हें पाला. स्नेह का एक और भी कारण था. गुड़िया फुआ की सहेली, जो कि उनके लिए बहुत प्रिय थी वो मेरी अपनी फुआ थीं जो मात्र पांच मिनट की बीमारी में दुनिया छोड़ चली थीं.
चार-बेटे और दो बेटियों का एक भरा - पूरा परिवार था दादी का. एक बहू भी नयी - नयी आईं थीं और अब एक दामाद भी. बाबाजी सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाते थे और थोड़ी सी पुस्तैनी जमीन भी थी गाँव में जिसपर खेती होती थी. दादी भी थीं लक्ष्मी, अपने कुशल गृह-प्रबंधन से कम आय में भी सब चका-चक रखती थीं. अपने मायके की बेहद धनी - मनी परिवार से थीं. उनके भाई मद्रास रहते और काफी पैसे-रुपये वाले शौक़ीन लोग थे. दादी साल-दो साल पर मद्रास जाती हीं रहतीं और हमें कई नई चीजें बतातीं. जैसे कि हम देहाती 'रिशेप्सन' शब्द से अपरिचित थे जिसे दादी ने हीं परिचय कराया, उनकी भातीज बहू के लिए हुआ था ये. भतीजी का 'इंगेजमेंट' हुआ था और यहीं नहीं उनके भाई के घर पैसा देने वाली मशीन भी थी जिसका बटन दबाते पैसे आ जाते थे. तब ये सुनना किसी स्वप्नलोक सा एहसास देता,आज बचपन की उसी पैसा देने वाली मशीन का रोज इस्तेमाल करने पर वो ख़ुशी नहीं मिलती जितनी तब केवल सुनकर मिलती थी.हमारे हिसाब से दादी का पूरा परिवार फ़िल्मी था,दादी ने सब देखा था... सब जाना था.
दादी मद्रास हीं नहीं,कलकत्ता की बातें भी जानती थीं. बड़े बेटे वहीं नौकरी करते थे इसलिए कई बार वहां से हो आई थीं. वहाँ की दुर्गापूजा, तारकेश्वर बाबा, बेलूर मठ और गंगा सागर का आँखों देखा हाल सुनकर हम बचपन में कितने खुश होते थे,आज वहाँ जाकर भी पता नहीं वो ख़ुशी मिलेगी की नहीं. लौकी की डंडी की सब्जी बनाना, चने की चटनी पीसना और केले के फूल से सुस्वादु व्यंजन बनाना तो पुरे गाँव में दादी हीं जानती थीं.यह सब उनके देश भ्रमण का नतीजा था. जिस तीर्थ पर जातीं वहां से वहाँ के भगवानों का विग्रह लाकर पूजा घर में जरुर सजातीं. उनका पूजाघर देखकर छप्पनों कोट के देवी-देवताओं के दर्शन हो जाते थे.
गाँव की बाकि महिलाओं से उनकी रूचि और स्वाभाव अलग थे. घर के काम के बाद वो उपन्यास पढ़ा करतीं और उसकी कहानियां लोगों से बतातीं. गाँव के गोशिप मोहल्ले से कोई परिचय नहीं था.
घर पक्का था और हमेशा चूने से पुता हुआ रहता था. फर्श कच्चे थे पर पिली मिट्टी से नियमित रूप से लिपाई होती थी. बाहर गुल्मेह्दी-और गेंदे के फूल मौसम के अनुसार लगे रहते और भीतर करीने से शमी वृक्ष और केले के पौधे लगे थे. दादी पूजा-पाठ भी बहुत करती थीं. बचपन में उन्हें पूजा करते देखकर ऐसा लगता जैसे छ्प्पानों कोट के देव उनसे संवाद कर रहे हों.
शाम को बाबाजी स्कुल से पढ़ाकर आते तो अक्सर साइकिल के कैरियर पर सफ़ेद रंग की बैटरी बंधी होती जिसे देखने पर हमारे भीतर एक बहुत बड़ी आशा का संचार होता -आज टीवी चलेगा.
बाबाजी के झोले में समोसे और जलेबियाँ रहतीं जिसे अक्सर हम भी खाते थे... दिन भर उनके साथ रहना.... इतना स्नेह मिला जितना शायद अब अवस्था अधिक होने के कारण अपने सगे पोते-पोतियों को भी शायद नहीं दे पाते हों... समाचार क्या होता है इसका पहला दर्शन बाबाजी के फिलिप्स जवान रेडिओ से शाम साढ़े सात बजे से आकाशवाणी पटना से आने वाले समाचारों को सुनकर जाना.
दिन भर वहीं तो रहते हम... शर्दी की धूप में दिनभर छत पर.. गर्मी की शाम को ठंडी हवाओं के बीच छत पर... टीवी देखने समय उनके आजू-बाजू उनके पलंग पर. सबकुछ अपना हीं तो था.
दादी का घर पूरा का पूरा आर्ट गैलरी था. किसी दिवार पर गुड़िया-प्रतिमा फुआ के बनाए शोपीस टंगे रहते तो कहीं दादी के आराध्य चित्रगुप्त जी की बड़ी-बड़ी तस्वीरें. सबसे ज्यादा आकर्षित करती थीं दादी के सबसे छोटे बेटे मुकेश चाचा की बनाई पेंटिग्स. मुकेश चाचा पटना में रहकर मेडिकल की तैयारी करते और छुट्टियों में घर आने पर बेहद खूबसूरत पेंटिंग्स बनाते. हूनर इतना था कि आपको देखकर हू-बहू चित्र उतार दें. मुकेश चाचा सजीले नौजवान थे. गाँव में पहले ऐसे लड़के थे जो मूंछ छिलवा कर पिता के सामने आ सकते थे.गोरी रंगत,क्लीन सेव और हीरो की तरह नए-नए फैशन के कपडे पहनते. कभी फिटिंग टी-शर्ट तो कभी काप्री... बड़ा होकर मैं मुकेश चाचा बनना चाहता था.... मतलब हीरो.
यादों की गाड़ी को आगे बढाता हूँ तो उस परिवार पर आई उस विपदा को भूल नहीं पाता जिसके दूरगामी असर ने उस परिवार को गाँव से दूर कर दिया.
एक दिन जब हमेशा की तरह बाबाजी पढ़ा कर अपनी साइकिल पर घर लौट रहे थे, उनका अपहरण कर लिया गया. एक सीधे-साधे शिक्षक की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी ! बात ये थी कि नारायणी के दियारे में रहने वाले जिन डाकुओं ने बाबाजी को उठाया था वो हमारे गाँव से, यहाँ के सरदार से अपनी दुश्मनी निकालना चाहते थे... बाबाजी मोहरा बनकर बूरे फंस गए... इस गाँव में रहने की बड़ी कीमत चूका दी.
इधर घर में हडकंप मच गया... दादी बार-बार बेहोश होतीं और पूरा गाँव सँभालने के लिए उनके आँगन में खड़ा. लोग उनके नेम-धरम का हवाला देकर सांत्वना देते कि कुछ न होगा, आपका सुहाग सकुशल लौट आएगा.
हुआ भी यहीं...
बाबाजी को अधमरा कर देने की हद तक मारने के बाड़ डाकूओं ने छोड़ दिया. उन्हें जो सन्देश देना था दे चूके थे.
महीनों तक उस घर में उदासी छाई रही और बाबाजी का इलाज़ चला...
यादों की गाड़ी अब हमें प्रतिमा फुआ के बारात की ओर ले जा रही है... लड़के वालों की जिद से शादी शहर जाकर करनी पड़ी, दियरा पार्टी के आतंक से लड़के वाले गाँव में बारात लेन को राज़ी नहीं हुए... फुआ शहर गयी और फिर वहीँ से ससुराल भी...
अब घर की रौनक कम हो गयी थी या हमारे देखने का नजरिया बदल चूका था...अब हम बड़े जो हो रहे थे.
दादाजी सेवानिवृत हुए और सरकार की ओर से मिले पैसों से शहर में बड़ा मकान बनवा लिया... अब उनका नया ठिकाना उनकी प्रतीक्षा में था, पुराना तो छूटना हीं था. कुछ सालों तक तो छठ-दीपावली में पुस्तैनी घर में आते रहे फिर यह सब अचानक से बंद हो गया. दादी अपने कुल देवी के साथ यहाँ के सारे देव-विग्रह ले गयीं. साथ में पड़ोस की रौनक भी उनके साथ चली हीं गयी...
घर परित्यक्त हो गया... वो घर जहाँ से अगरबत्तियों की सुगंध आती थी, वो घर जहाँ पूरा टोला टीवी देखता था, वो घर जहाँ हर दुसरे - तीसरे साल शादी-विवाह होते, भोज होता अब वो खँडहर में बदल चूका है.... यादों की गाड़ी अब यहीं रुक जाएगी क्योंकि हमारे सबसे अच्छे पड़ोसी अपने पड़ोसी धर्म का जिम्मा सांप-बिच्छुओं को देकर हमसे दूर जा चुके हैं..







बड़े सफाई से आपने इतनी सारी बातें कुछ इस तरह बताईं के वक़्त का पता ही चला और अपने लेखन को पढ़ कर मुझे अपने गांव की रोचक बातें याद आने लगी!
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