भिनसार के मोती...

वैशाख की हल्की गर्म रात 'भिनसार' {ब्रह्ममुहूर्त} में पहूंच कर गुलाबी  ठंढ पैदा कर रही है.... आस-पड़ोस के कुत्ते रात भर की चौकीदारी से थक-हारकर सो चुके हैं, ठंडी हवा के साथ-साथ वातावरण एकदम से शांत है... ईश्वर के स्वागत को तैयार इसी प्रकार की बेला को 'ब्रह्ममुहूर्त' कहा जाता है.
गाँव के घर के गोलकमरे में इसी गुलाबी ठण्ड से एक पतली चादर के अन्दर छूपा पड़ा हूँ... गुलाबी सपने थपकियां दे रहे हैं.
तभी दरवाजे की सांकल बजती है और हल्की सी आवाज भी आती है - 

" हाल्दी से उठीं ! ना तs लोग सब बीन ले जाई... "

सुनते हीं जितेन्द्रिय पुरुष की भांति बिना मोह-माया के, ख्वाबों के दामन को झटक देता हूँ और चादर ओढ़, आँखें मसलते दरवाजा खोलता हूँ...
हाँथ में सिकौति लिए सामने खड़ी है 'मनतुरनी' ...
 मन्तुरनी, पूरन महतो की बेटी. साथ में हैं कहार टोली के और भी कुछ बच्चे जो इस घुप अँधेरे में कहीं जाने और मुझे ले जाने को आतुर हैं...                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          
उन्हें साथ लेकर निकल पड़ता हूँ सीधा गाँव के पश्चिम...  भगवती स्थान के ठीक सामने है पुश्तैनी बगीचा जिसे सबलोग 'नानी के फुलवारी' कहते हैं. 
वहां पहूंचते हीं मन एक नैसर्गिक सुगंध से मतवाला हो जाता है... सामने मोटे तने और दर्जनों शाखाओं-प्रशाखाओं के साथ निर्भीक खड़ा वह पेड़ जैसे प्रतीक्षा में है... यहीं है वो, जिसे पिताजी के नानाजी ने बड़े यत्न से लगाया था. जमीन उसके बिखराए मोतियों से सज गयी है... 
उन बच्चों को सही जगह बैठाकर मैं भी अपने पूर्वज के कीरति  रत्न को जमीन से उठाकर साथ लाए चंगेरों में भरने लगता हूँ. इसी रत्न को कहते हैं 'महुआ' 

                                                                            बच्चे ऊँघने लगते हैं... मन्तुरनी गरियाती है. 
जल्दी-जल्दी चुना हीं नही जाता... मन बहलाने के लिए मन्तुरनी झिझिया के गीत गाने लगती है.... इससे भी नहीं होता तो कहानी सुनाती है कि कैसे रात को एक सांप महुए के पेड़ से नीचे से गुजर रहा था तो ऊपर से गिरते महुए से उसका सिर फूट जाता है., इसपर नाराज होकर सांप कहता है -                                                          

" ए टुप-टुपुआ ! कापार काहे फोरsले ? " 

फिर महुए का पेड़ तुनक कर जवाब देता -

" ठेंगुड़ी-मेंगुड़ी रात काहे चलsले ? "
मतलब की जब पैर नहीं हैं और घिसट कर चलना है तो रात के अँधेरे में क्यों चलते हो ?

अब बच्चों की तन्द्रा भंग होती है और पूरे मनोयोग से काम शुरू होता है. .. ऊपर से नीचे तक लटके छत्तों से सफ़ेद-सफ़ेद मोती के दानों से महुए का गिरना जारी रहता. कभी सर पर तो कभी पीठ पर टपा-टप बरसात होती रहती, ऐसा लगता जैसे यह बुढा पेंड़ हमारे साथ खेल रहा हो...                                                                        
 इसी तरह भिनसार से उजाला होने लगता है... आस-पास के खेतों से होकर हसिया झुलाते गेहूं काटने वाले गुजरने लगते हैं. जमीन प्राय: खाली हो जाती है और महुए के सारे दाने साथ लाए सिकौति-चंगेरों में भर जाते हैं.                                                                             
मन्तुरनी का मन इतने से भी नहीं मानता और वो दुधारू गाय की तरह पेड़ को भी दूहना चाहती है, ताकि ज्यादा से ज्यादा महुए हों... पास के खेत से गोबर लाती है और पेड़ की परिक्रमा करके उसके तने में मलने लगती है... इस टोटके के साथ भोजपूरी के मन्त्र भी पढ़ती है -                                                                                        
 " गोब-गोबरहुआ... महुआ चुभ्भूक्क्क्क !!!!!!!!!!!!!!!! " 
           
फिर कुछ देर अपने ममहर की बातें करते हुए और महुआ गिरने का इंतज़ार करती है... मैं कहता हूँ कि "            
 जल्दी कर मार्निंग इस्कूल हो गया है, जल्दी जाना है... "                                                                                                                                                                                                                                                 टोटका काम करता है या उस गरीब पर ईश्वर की कृपा होती है कि दस-बीस मिनट में फिर से जमीन कुछ-कुछ दानों से भर जाती है.                                                                                                                                       



                                                 


टोकरों में सबकुछ समेट कर अब घर की ओर कदम बढ़ाते हैं... बिल्कुल उसी प्रकार जैसे छठ में लम्बे समय तक घाट सेने के बाद अर्घ्य देकर प्रसाद स्वरुप सारे पूण्यार्जन को चंगेरों-टोकरों में बाँध कर घर की ओर कदम बढाते हैं...                                                                                                                                                            



लगातार एक महीने तक ब्रह्ममुहूर्त में  जगना और पुश्तैनी बगीचे में अपने पूर्वज के लगाये महुए तले जाकर  साधना का कर्म चलता रहता... तब उन सफ़ेद दानों को उठा कर इतनी ख़ुशी होती थी जितनी आज हीरे के टुकड़े मिलने पर भी नहीं होगी...                                                                                                                                 
कहाँ गया वो जमाना ! जहाँ भी गया हो पर आज स्मृतियों में वापस लौट आया है... मेट्रो के इस मिडनाईट में गाँव का वो भिनसार और उसके खुबसूरत मोतियों की बड़ी याद आ रही है. . ...                                                    



Comments

  1. ऊपर से नीचे तक लटके छत्तों से सफ़ेद-सफ़ेद मोती के दानों से महुए का गिरना जारी रहता. कभी सर पर तो कभी पीठ पर टपा-टप बरसात होती रहती, ऐसा लगता जैसे यह बुढा पेंड़ हमारे साथ खेल रहा हो...

    टोटका काम करता है या उस गरीब पर ईश्वर की कृपा होती है कि दस-बीस मिनट में फिर से जमीन कुछ-कुछ दानों से भर जाती है.
    bahut shandar dost, aap bahut bareeki se mahaul ka varnan krte ho yahi aapki khoobi bahut acchi lagati hai....

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    1. धन्यवाद श्रीमान !

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    1. शुक्रिया जनाब... नजर बनी रहे, लिखने में मज़ा आता रहेगा...

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  3. अच्छा लगा पढ़कर ।

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    1. शुक्रिया जनाब... यूहीं नजर बनाए रखें...

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  4. Bs aap ase hi likhte rahiy :) padh k hm inhi sb wadiyo m chale jate h

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  5. वाह भैया गजब एकदम रेखाचित्र उकेर दिए है आप...

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