जीत की मिठाई

सवेरे से वह उद्विग्न है... परेशान सी कभी रसोई में पक रहे खाने तो कभी पूजा घर के चक्कर लगा रही है। मोबाइल हाथ हीं में रखी है। कलेजा धड़धड़ा रहा है। पता नहीं इस बार क्या होगा ! मुखिया पति की अच्छी ख़ासी ईज्जत है। इस बार सीट आरक्षित होने के कारण पति ने उसी से परचा भरवाया है। क़रीब दो महीने प्रचार हुआ है... बैनर-पोस्टर, माईक, पदयात्रा... लगा हुआ है।
ग्राम पंचायत राज धरौरा से सुयोग्य, कर्मठ, जुझारू और सुयोग्य महिला प्रत्याशी रंजू देवी, पत्नी राजू सिंह।
जिंदाबाद - ज़िंदाबाद !!!
घर की चाहरदिवारी से सबकुछ सुनती देखती रही है। मन में एक अनजान भय बना हुआ है। कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गया तो बड़ा अपयश होगा। लोग कहेंगे मुखियवा ने पत्नी को लड़ाया, कुलच्छनी निकली, हार गया।

तभी घण्टी बजती है... तहसील में मतगणना को गए पति की आवाज़ है - " ड्राईवर को कहो तुम्हे यहाँ ले आए, हम जीत गए हैं "
तुरन्त पूजा घर की ओर भागती है और देवी के स्थान पर गिर ख़ुशी से रोने लगती है... " हे माई ! पूजा-पाठ सार्थक हो गया... आपने मेरी लाज और पति की ईज्जत दोनों बचा ली। "
तेल-सिंदूर का लेप चढ़ा स्कार्पियो में बैठ जाती है। तहसील पहुँचती है तो देखती है पति को लोग कन्धों पर उठाए नाच रहे हैं... माला से लाद इतना गुलाल लगाए हैं कि मूँह पहचान नहीं पा रही। उसके आने की ख़बर पाकर पति भीड़ में से आता है और उसे ले अफ़सर के पास जाता है।
सर्टिफिकेट मिल चुका है... वापस गाड़ी में बैठाने आए पति बताते हैं " मिठाईयों का डब्बा रखवा दिया है, तुम चलो हम जुलूस लेकर आते हैं "
मुखियई का सर्टिफिकेट थामे घर आ जाती है। कुछ हीं घंटों में 'राजू सिंह जिंदाबाद !' 'जिंदाबाद-ज़िंदाबाद' के नारे लगाती भीड़ के साथ मुखिया जी प्रकट होते हैं। बजनिए बजा रहे हैं... लोग ख़ुशी में नाच रहे हैं।
काजू की बरफी तो किसी के लिए लड्डू, हैसियत के अनुसार नौकर के हाथों बाहर भिजवा रही है। बीच-बीच में मन नहीं मानता तो जंगले से झाँक कर बाहर उड़ते गुलाल और नाच-बाजे का दृश्य देख लेती है। फिर बाहर से मिठाई के लिए ख़बर आती है और वापस रसोई में चल पड़ती है।
प्लेट ने मिठाईयाँ सजाते अपना चेहरा देख ख़ुश होती है - "मैं मुखिया बन गई, आजादी के बाद से पंचायत की पहली औरत मुखिया "
मन करता है कि बाहर जाए... अपनी जीत के इस जलसे में नाचे। कार्यकर्ताओं से माला पहने और सबको अपनी हाथों से मिठाई खिलाए। पर ऐसा कर सकने में खुद को अक्षम पाकर  मन मसोस लेती है। ख़ुशी काफ़ूर सी होने लगती है... उसकी जीत का सेहरा पति को अपने सर बाँधते देख मन कड़वा हो जाता है। इन्हीं विचारों में खोई नाख़ुश हुई हीं है कि नौकर फिर से मिठाई के लिए आ जाता है।

" का हुआ मैडम ! मूँह चढ़ल है, आज तो खुसी का दिन है। "

फिर से मिठाई भेज अपने विचारों में लौटती है। एकदम बदली हुई... ख़ुद को झिड़कती है। ये मैं क्या सोचने लगी थी ? पति के कर्मों में सहभागी होना हीं तो मेरा धर्म है, कैसे मैं उनसे जल सकती हूँ ! "
पूजाघर में देवता के आगे सँझा- बाती करने आती है और मन हीं मन अपने विचारों के समर्थन में तर्क सोचने लगती है...
अग़र इन्होंने मुझसे शादी की है तो इनसे ब्याह मेरा भी हुआ है ! पर ये मेरे घर बारात लेकर आए थे, हँसते-मुस्कुराते गाजे-बाजे के साथ सबको अपना चेहरा दिखाते। पर मैं ? मैं तो एक हाथ लम्बा घूँघट काढ़े बैठी रही और उसी दशा में इनके घर भी आ गई। घूँघट में हीं उतारी गई और चाहरदिवारी में कैद हो गई। आज जीत कर भी हारी हूँ, परम्पराओं के आगे।
खीझ कर मन को संतोष देती हुई मन में कहती है - " ये मर्दों की जात बड़ी बेशर्म है, जुलूस में नाचना इनका स्वाभाव होता है। दूसरों की चीजों को अपना बना लेना कोई इनसे सीखे। मैं भीतर हीं ठीक हूँ, नीव की पत्थर में हीं ठीक हूँ। कम से कम एक के लिए समर्पित तो हूँ ! मेरी मुखियई लेकर आज से ये न जाने किस-किस को छलेगा... "
नौकर फिर मिठाई के लिए आता है तो तन्द्रा टूटती है... फिर पूजा घर से वापस रसोई में पहुँच जाती है, जहाँ की यात्रा 10 सालों के वैवाहिक जीवन में हर दिन तय करती रही है...

Comments

  1. ये कहना शायद बेमानी होगा कि बहुत अच्छा है;सच लिखा है तुमने और जैसे मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक अंदाज में तुमने महिला का चित्रण किया है वह बिलकुल असल है;एक नग्न सच।।

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  2. सामाजिक मान्यताओं में बाधित महिला का विकास. यहाँ हर जीत का शेहरा पितृसत्ता के मत्थे ही मढ़ा जाता है. बहुत ही आसान तरीके से आपने बड़ा सच कहा है!

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  3. आपने इस कहानी के माध्यम से समाज की ग्रामीण स्त्री के उस उतार चड़ाव की दिखाया है , जिसे शादी कर के लाया उसका पति भी नहीं देख पाया ! आपकी लेखनी को सलाम 👏👏

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  4. वाह!कमाल।👍👌

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