हरख तिवारी का क़िस्सा

( नदियों के किनारे बसे गाँवों में उसे बसाने वालों की दिलेरी के अनगिनत क़िस्से चलते रहते हैं। )


ये क़िस्से किसी महाकाव्य की तरह अतिशयोक्तियों और उन्हीं की तरह कुछ ख़ास रूढ़ियों के दोहराव से भरे होते हैं| हाथी-घोड़े और जर-ज़मीन लेकर दरबारी इन्हें किसी दरबारी कवि ने नहीं लिखा| यह लोक-चेतना में बसते गए और विकसित होते गए| तमाम वीरगाथा काव्यों की तरह ये क़िस्से भी अप्रमाणिक हैं| मगर इसकी व्याख्या और विश्लेषण से इतिहास और तब के समाज का अक्स देखा जा सकता है| ये कहानियाँ ज़मीन पर रहने, खेत कोड़ कर खाने वाले उनके बेहद मामूली वंशजों के लिए आत्मविश्वास का श्रोत रही हैं|

ऐसी ही एक कहानी सुनिए ________ 

तब रिश्ते सिर्फ़ लड़के-लड़की को देख कर ही तय नहीं होते थे| परिवार देखा जाता था, ख़ानदान देखे जाते थे, गाँव-जवार और समाज देखे जाते थे| तब तय होता कि भावी बहू या दामाद कैसे होंगे! उनके साथ कैसे पेश आना है|

तब आपके रिश्ते सिर्फ़ आपके निजी रिश्ते नहीं थे| रिश्ते आपके होते और उनका निर्वाह कोई और किया करता| वो ज़माना ही और था| हम उस ज़माने के चाहे नहीं हैं मगर उसके अवशेषों पर बने परिवारों में पैदा ज़रूर हुए हैं| हमारी यादाश्त में उन सभी बातों की जगह है|

..तब हमारा घर बँटा न था| प्लास्टर-टाइलों से सजे चार आधुनिक मकानों की बजाए एक ही खपरैल घर था| बाबा घर के मुखिया थे और बाक़ी के उनके दो छोटे भाई नौकरी और ओहदे में बड़े होकर भी उनके मातहत थे| घर की सभी बड़ी औलादें बड़े भाई की अपनी थीं, चाहे उनके पिता बड़े भाई हों या वे छोटे की संतानें हों| पहलौंठों पर बड़े का हक़

ऐसे में बाबा ने अपने भतीजे की बहू का चुनाव बहुत सोच-समझ कर किया था| 

बाबा को उनका कुल-ख़ानदान पीढ़ियों से पता था इसलिए वे बहू से बात किए बिना भी उसके स्वाभाव से अनजान नहीं थे|

बहू का ख़ास ख़याल रखने के लिए जनाने की औरतों को ताक़ीद करते रहते थे| बाबा कहा करते कि 'दुलहिन हरख तिवारी के ख़ानदान से हैं सो इन्हें खाने पीने की कोई दिक़्क़त न होनी चाहिए। इन्हीं के पुरखा थे हरख तिवारी जिन्होंने खाने के लिए ही बेतिया के राजा का दो सौ भार लूट लिया था।'

अपने पुरखे की बातों पर गर्वीली होती हुई बड़की माई उसके बाद कहानी कहना शुरू करतीं| हरख बाबा जो उनके नैहर भरवलिया, थाना मलाही ज़िला पूर्वी चम्पारण के आदि पुरूष थे| गोपालगंज ज़िले के 'गौसियाँ' गाँव से आकर यहाँ बसे थे|

      (अतीत का हिस्सा हो चुके बेतिया राज का राज-चिन्ह)

हुआ यूँ कि बेतिया राज के अंतिम महाराज हरेन्द्र किशोर सिंह  छोटे थे और तब वे संभवतः युवराज की हैसियत में रहे होंगे| उनका जनेऊ पड़ा था| गोपालगंज का हथुआ राज बेतिया राज का सम्बन्धी था इसलिए इस शुभ अवसर पर उसके लिए उपहार भेज रहा था| उपहार में क्या, दही की हँड़िया, चिवड़े के भरे दउरे, केला-फल और किसिम-किसिम की मिठाइयाँ| सब भार नदी के रास्ते भरिया लिए जा रहे थे| हरख बाबा को पता चला और उन्होंने भार को राजधानी बेतिया की ओर बढ़ने ही नहीं दिया| दही-चिवड़ा से भरे दो सौ भार अपने दरवाज़े पर रखवा लिया| हिम्मत देखिए..

जब राजा को पता चला तो हरख तिवारी बेतिया दरबार में तलब किए गए, लोगों ने कहा 'आज फाँसी होगी।' 

राजा ने पूछा - 'भार तुमने रोका है?'

                   'जी, हजूर'

               'क्या कारण हय?'

'हजूर, राजा घरे खाए-पीए के सामान की भला का।कमी! खाये वाला सामान पर त भुखाइल के हक-हिस्सा होला। एकरा त हमार घरों में होना चाहिए जहवाँ खाए वाले ढेर हैं मगर उनके  खाए को पूरा नाहीं पड़त।'

'कुल केतने हैं तुम्हरे परिवार में?'

'हजूर, पन्द्रह'

'तुम केतना खाते हो?'

'तीन सेर चाउर के भात और एतनी ही रोहू मछरी..'

राजा ने कहा 'ठीक है, अगर एतना खा गए तो दण्ड माफ़ और जदी न खाए तो फाँसी चढ़वा देंगे।'

राजा के कहे भर से हरख तिवारी के सामने इतना सब लाया गया और उसमें से दो कौर कई दिनों से भूखे अपने पोसुआ कुत्ते को देने के अलावे तिवारी बाबा सब खा गए|

राजा उदार थे| अनुभव किया कि ऐसे वीर और बलशाली को यूँ भूखा नहीं छोड़ना चाहिए| इससे राज का अहित होगा| इसे दण्ड नहीं ज़िम्मा देना चाहिए|

वो ज़माना था जब मज़बूत लोगों से बदला नहीं काम लिया जाता था| हरख तिवारी को राजा ने ज़मीन दी और मछरी खाने के लिए नखी अलग से| संभवतः उन्हें राजा की सैन्य सेवा में रखा गया होगा|

हरख बाबा बेतिया से ख़ुशी-ख़ुशी लौट आए|

चलते-चलते उनकी वीरता का एक और क़िस्सा..


तब नदी डीह से होकर बहा करती थी जिसके ऊपर कटहर का गाछ था| एक बार जब सावन-भादो में नदी बढ़िआई थी तब उसी कटहल तले हरख बाबा की लौंडिन मंतुरनी बर्तन माँज रही थी|
 ..कि गोह ने उसे पकड़ लिया|

हरख बाबा को पता चला| बाबा अपनी सेविका को यूँ कैसे मरने देते! उन्होंने एक रस्सा लिया| उसका एक सिरा कटहल के पेड़ में और दूसरा अपनी कमर में बाँध भादो के भरे दरियाव में कूद पड़े| मंतुरनी को अपने पेट में भर कर गोह ज़्यादा दूर नहीं गया था| बाबा ने उसका मुँह चीर कर बाहर निकाला और उसकी  जान बचाई|

ऐसे थे हरख बाबा| उनका समय कब था यह ठीक-ठीक किसी को पता नहीं| मगर उनके ख़ानदान का महत्व क्या था इसे हमारे ख़ानदान वाले बखूबी समझते थे| तभी तो हमारे बाबा के बाबा ने हरख कुल के तिवारियों में अपनी बेटी का ब्याह किया था| 

बाद में हमारे बड़के बाबा ने इस रिश्ते में एक और अध्याय जोड़ दिया| उलटी रुख़्सती करवाई और अपने सबसे बड़े बेटे के लिए उसी ख़ानदान की लड़की चुनी|

जबकि रीति यह थी कि जहाँ पर जो चीज़ देते हैं वहाँ से वहीं चीज़ लेते नहीं हैं| जहाँ बेटी देते हैं वहाँ की बेटी लाते नहीं हैं| मगर उस वीर-भूप ख़ानदान से सिर्फ़ एक तरफ़ा रिश्ता जोड़ कर भला कौन तसल्ली करता! इसलिए रिश्ते की रस्सी को हरख बाबा की कमर और कटहर के गाछ की तरह दोनों सिरों से बांध दिया गया| दोनों ही कुलों की बेटियों का दोनों ही कुल ससुराल हुआ| 

वह लड़की जो हम सबकी बड़की माई थीं और बाबा जिनके खाने-पीने का विशेष रूप से ख़याल रखने के लिए जनाने की औरतों को आगाह करते रहते थे...

                            【समाप्त】

Comments

  1. बहुत ख़ूब

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  2. बहुत खूब मित्र 🙏

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  3. बहुत खूब

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  4. बहुत बढ़िया,रोचक कथा👌👌👍👍😊

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  5. बिहार के इस क्षेत्र की , एक समय के कथा को आपने शानदार भाषा में दर्ज किया है!

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